पेचिश । प्रवाहिका पर क्या खाएं, क्या न खाएं और रोग निवारण में सहायक उपाय

पेचिश । प्रवाहिका – Dysentery

पेचिश रोग में पाखाना जाने की बार-बार हाज़त होती है, लेकिन काफी ऐंठन (मरोड़) व पेट दर्द के साथ मल में थोड़ी-थोड़ी आंव निकलती है। बड़ी आंतों में जब सृजन और जख्म बन जाते हैं, तो उनसे आंव/सफेद चिकना पदार्थ (Mucus) और खून निकलकर गुदा मार्ग से गिरता है।

कारण : पेचिश उत्पन्न होने के प्रमुख कारणों में अहितकारी आहार-विहार करना, अग्निमांध, अजीर्ण, दूषित पानी पीने, अत्यंत गर्म, तीखे, मिर्च-मसालेदार गरिष्ठ पदार्थों का सेवन, कब्ज की शिकायत, कीटाणु संक्रमण, अमीबा संक्रमण (अमीबिक) आदि होते हैं।

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लक्षण : लक्षणों के रूप में बार-बार आंव व रक्त युक्त दस्त होना, पेट में ऐंठन (मरोड़) की पीड़ा होना, धीरे-धीरे दस्तों की संख्या बढ़ते जाना, शारीरिक दुर्बलता, पाचन शक्ति कमजोर पड़ना, खुराक घटते जाना, खाया-पीया अंग न लगना, भोजन के बाद ही मल विसर्जन की इच्छा होना, ज्वर, सिर दर्द, प्यास अधिक लगना आदि देखने को मिलते हैं।

What to eat during Dysentery?

क्या खाएं

  • दूध की चाय बनाकर पिएं। पानी उबालकर सेवन करें।
  • अरारोट, मट्ठा, पका या भुना कच्चा बेल, कच्चा सिंघाड़ा, भुनी लौकी, भुना हुआ कच्चा केला, खूब पका केला, एकदम पतला दलिया, धान के लावे का मांड़ आहार में खाएं।
  • पहले कुछ दिन दही की पतली लस्सी पिएं, फिर दही मिले चावल तथा दही के साथ खिचड़ी का सेवन करें।
  • बकरी या गाय का दूध गर्म-गर्म ही 4 से 6 चम्मच की मात्रा में 3-4 बार पिएं।
  • ज्वर उतरने या कम रहने पर चावल का मांड़ या अनार का रस दिन में 3-4 बार एक-एक कप की मात्रा में सेवन करें।
  • मूंग की दाल, बेल का मुरब्बा, पका पपीता, संतरा, मौसमी का रस, पका सेब आदि खाएं।

What not to eat during Dysentery?

क्या न खाएं

  • भारी, गरिष्ठ, तले, मिर्च-मसालेदार, उत्तेजक खाद्य पदार्थ न खाएं।
  • नया चावल, बैगन, फूल गोभी, कटहल, आलू, मांसाहार का सेवन न करें।
  • शराब, तंबाकू, गुटखा, कॉफी, नशीले पदार्थों से परहेज करें।
  • भोजन में उड़द की दाल का सेवन न करें।
  • नये रोग में नीबू, खट्टे अंगूर, खट्टे संतरे, आम की खटाई न खाएं।
  • गुड, घी, तेल तथा बिना उबला पानी सेवन न करें।

Remedial Measures in Dysentery Prevention.

रोग निवारण में सहायक उपाय


What to do during Dysentery?

क्या करें

  • खुली साफ हवा में रहते हुए पूरा आराम करें।
  • कोई न कोई हलका व्यायाम नियमित करें।
  • आंतों की सफाई के लिए गुनगुने पानी का एनिमा लें।
  • रोजाना रात्रि में मिट्टी की पट्टी पेडू पर बांधें।
  • ईसबगोल की भूसी एक चम्मच की मात्रा में एक कप गर्म पानी के साथ सेवन करें।
  • अधिक दर्द होने पर पेट की सिकाई गर्म पानी की थैली से करें।

What not to do during Dysentery?

क्या न करें

  • शौच की हाज़त को न रोकें।
  • यहां-वहां का गंदा, दूषित पेयजल न पिएं।
  • रोगी के मल में बीमारी के कीटाणु होते हैं। अतः शौचालय में सफाई रखें।
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