बेल के फायदे । बेल से करे पेट की सभी बीमारियों का इलाज

उदर रोगों में गुणकारी बेल

उदर रोगों में बेल फल गुणकारी औषधि की तरह लाभ पहुंचाता है। छोटे बच्चों को दांत निकलते समय अतिसार बहुत होता है।

ऐसे में उन्हें बेल की गिरी का सेवन कराया जाए तो अतिसार की विकृति नष्ट होती है। आधुनिक परिवेश में अधिकतर लोग कोष्ठबद्धता से पीडित होते हैं।

Loading...

अनेक औषधियों का सेवन भी उनकी कोष्ठबद्धता को नष्ट नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में बेल का चूर्ण, बेलगिरी या बेल का मुरब्बा खाने से कोष्ठबद्धता का सरलता से निवारण होता है। उदर शूल, रक्तातिसार, अग्निमांद्य, अजीर्ण, अतिसार, प्रवाहिका (पेचिश), आंतों में मल के एकत्र होने, अम्लपित्त, संग्रहणी, गुल्म (वायु गोला) आदि रोगों में बेल से बहुत लाभ होता है।

अरुचि । भूख न लगना

Anorexia nervosa ~ Distaste

 

भोजन में अरुचि होने पर स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों को भी खाने की इच्छा नहीं होती है।

अरुचि से पीडित रोगी स्वयं परेशान हो जाता है। वह अरुचि का कारण नहीं समझ पाता।

Why does Anorexia nervosa happens?

भूख न लगना क्यों होता है?

उत्पत्ति : उदर में अधिक समय तक कोष्ठबद्धता की विकृति बनी रहे तो भोजन के प्रति अरुचि उत्पन्न होती है। कोष्ठबद्धता के कारण भूख नहीं लगती।

मल का निष्कासन नहीं हो पाने से पेट में भारीपन होने से किसी चीज को खाने की इच्छा नहीं होती। पाचन क्रिया की गड़बड़ी भी अरुचि की उत्पत्ति करती है।

What are Symptoms of Distaste?

भूख न लगना के लक्षण क्या है?

लक्षण : रोगी को भूख नहीं लगती। उदर में अफारा-सा बना रहता है। हल्का-हल्का पेट दर्द होने से कुछ खाने को मन नहीं करता। ऐसे में स्वादिष्ट पकवान भी रोगी के सामने रखे जाएं तो उन्हें खाने की इच्छा नहीं होती। रक्ताल्पता की विकृति में अरुचि अधिक होती है।

Steps to cure Distaste.

चिकित्सा

  • बेलगिरी के शर्बत में नीबू का रस मिलाकर पीने से अरुचि नष्ट होती है। बेलगिरी का शर्बत पाचन क्रिया को तीव्र करके भूख बढ़ता है।
  • कोष्ठबद्धता के कारण अरुचि होने पर पहले कोष्ठबद्धता को नष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए। कोष्ठबद्धता को नष्ट करने के लिए बेल की गिरी (गूदे) का 5 ग्राम चूर्ण मिलाकर रात्रि को हल्के गर्म जल के साथ सेवन करें। कोष्ठबद्धता नष्ट होते ही अरुचि का निवारण हो जाता है।
  • बेल का मुरब्बा खाकर, ऊपर से दूध पीने से भी कोष्ठबद्धता नष्ट होने पर अरुचि का निवारण हो जाता है।
  • बेलगिरी के गूदे में मधु मिलाकर खाने से अरुचि नष्ट होती है।
  • बेल के गूदे को जल में डालकर रख दें। प्रातः उठकर उस गूदे को थोड़ा-सा मसलकर छान लें। उस रस में चीनी मिलाकर, शर्बत की तरह सेवन करें। नीबू का रस मिलाने से शर्बत अधिक स्वादिष्ट बन जाता है। उसके सेवन से रोगी को जोरों की भूख लगती है।

अजीर्ण । अपच

Dyspepsia ~ Indigestion

 

हर समय कुछ-न-कुछ खाते रहने की प्रवृत्ति स्त्री-पुरुषों को अजीर्ण रोग से पीडित करती है। अजीर्ण रोग में भोजन पूरी तरह पच नहीं पाता, ऐसे में फिर कुछ खा लिया जाता है तो रोगी को बहुत बेचैनी होती है।

डकार नहीं आने अर्थात उदर की दूषित वायु नहीं निकल पाने से गुड़गुड़ाहट होती रहती है।

Why does Indigestion happens?

अपच क्यों होता है?

उत्पत्ति : पाचन क्रिया विकृत होने से अजीर्ण की उत्पत्ति होती है। भोजन में अधिक वसायुक्त पदार्थों, जैसे घी, दूध, मक्खन आदि के सेवन करने पर जब पाचन क्रिया पूरी तरह नहीं होती है तो अजीर्ण की उत्पत्ति होती है। दिन में अधिक सोने, रात्रि को अधिक जागरण करने से भी पाचन क्रिया विकृत होने पर स्त्री-पुरुष अजीर्ण से पीडित होते हैं।

चिंता, शोक, भय, क्रोध की स्थिति में भोजन करने पर उसका पूरी तरह पाचन नहीं होता। ऐसी स्थिति में अजीर्ण की विकृति होती है। भोजन के साथ अधिक जल पीने से भी अजीर्ण हो जाता है।

What are Symptoms of Indigestion?

अपच के लक्षण क्या है?

लक्षण : भोजन के नहीं पचने से रोगी के उदर में हल्का शूल, भारीपन और गुड़गुड़ाहट होती है। रोगी के सिर में दर्द और वमन के लक्षण भी दिखाई देते हैं। अजीर्ण रोग में शरीर में भारीपन, कमर में जकड़न, विभिन्न अंगों में पीडा, अधिक प्यास के लक्षण होते हैं। भोजन में अरुचि, पेट में अफारा और कोष्ठबद्धता की विकृति अजीर्ण में होती है। अजीर्ण रोग की चिकित्सा में विलम्ब करने से ज्वर, कंठ और अन्न नली में तीव्र जलन और सिर में चक्कर आने के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

Steps to cure Indigestion.

चिकित्सा

  • बेल फल सुबह-शाम खाने से पाचन क्रिया की क्षीणता यानि अग्निमांद्य की विकृति नष्ट होती है। पाचन क्रिया प्रबल होने पर अजीर्ण रोग का निवारण होता है।
  • बेल की गिरी को 50 ग्राम मात्रा में लेकर जल में अच्छी तरह मिक्स कर लें। इसमें काला नमक और नीबू का रस मिलाकर पीने से अजीर्ण रोग नष्ट होता है।
  • बेल की ताजी, कोमल पत्तियों को कूट-पीसकर, किसी कपडे में बांधकर रस निकालें। 10 ग्राम पत्तियों के रस में काली मिर्च का 1 ग्राम चूर्ण और थोड़ा-सा नीबू का रस मिलाकर दिन में दो बार पीने से अजीर्ण की विकृति नष्ट होती है।
  • अजीर्ण में बेल का शर्बत दिन में दो बार पीने से बहुत लाभ होता है।

उदर शूल । पेट दर्द

Abdominal Pain ~ Stomach Pain

उदर शूल अर्थात पेटदर्द से कोई भी स्त्री-पुरुष पीडित हो सकता है। छोटे बच्चे उदर शूल से अधिक पीडित होते हैं, क्योंकि वे हर समय कुछ-न-कुछ खाते-पीते रहते हैं। जब उन खाद्य पदार्थों का पाचन नहीं होता है तो उदर में तीव्र शूल होने लगता है। उदर शूल से रोगी बुरी तरह व्याकुल हो उठता है।

Why does Stomach Pain happens?

पेट दर्द क्यों होता है?

उत्पत्ति : चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अजीर्ण, अग्निमांद्य और कोष्ठबद्धता (कब्ज) के चलते, जब भोजन किया जाता है तो उदर शूल की उत्पत्ति होती है। अधिकांश स्त्री-पुरुष और बच्चे कोष्ठबद्धता के कारण उदर शूल से अधिक पीडित होते हैं।

गरिष्ठ अर्थात देर से पचने वाले, अधिक शीतल खाद्य पदार्थों से उदर शूल की अधिक उत्पत्ति होती है।

उदर में कृमि (कीड़े) होने पर हर समय हल्का-हल्का शूल होता रहता है, लेकिन जब कृमि जोरों से काटते हैं तो तीव्र शूल होता है।

दूषित और बासी भोजन करने, उड़द की दाल, चावल, गोभी आदि वायु विकार उत्पन्न करने वाले खाद्य पदार्थों से भी उदर शूल की शीघ्र उत्पत्ति होती है।

What are Symptoms of Abdominal Pain?

पेट दर्द के लक्षण क्या है?

लक्षण : उदर में तीव्र रूप से शूल होता है तो रोगी बुरी तरह से तड़प उठता है। उदर में नाभि के आसपास मरोड (ऐंठन) की तरह शूल होता है। उदर शूल के अधिकांश रोगी कोष्ठबद्धता से पीडित होते हैं। उदर शूल में भोजन के प्रति अरुचि होती है और रोगी बहुत घबराहट अनुभव करता है।

जब वायु विकार (गैस) के कारण उदर शूल होता है तो हृदय के जोरों से धड़कने के कारण अधिक घबराहट होती है। उदर शूल के रोगी को वमन भी हो सकती है। उदर में अधिक भारीपन और सिर में दर्द भी हो सकता ।

Steps to cure Stomach Pain.

चिकित्सा

  • बेल के कोमल व ताजे पत्तों को काली मिर्च के दानों के साथ पीसकर मिश्री मिलाकर जल के साथ सेवन करने से उदर शूल नष्ट होता है। दिन में दो-तीन बार अवश्य सेवन करें।
  • आंव विकृति के कारण उदर में शूल हो रहा हो तो बेल के कच्चे फल को गर्म राख या रेत में भूनकर, फिर उसको साफ करके, काटकर गूदा निकालकर उसका रस निकालें। इस रस में मिश्री मिलाकर पीने से आंव विकृति के नष्ट होने से उदर शूल भी नष्ट होता है।
  • बेल के कोमल व ताजे पत्तों का रस निकालकर, उसमें काली मिर्च का चूर्ण और मिश्री मिलाकर सेवन करने से उदर शूल नष्ट होता है। आंतों में शोथ के कारण उत्पन्न शूल भी नष्ट होता है।
  • कुछ स्त्री-पुरुषों को कोष्ठबद्धता के कारण कई दिन तक शौच नहीं जाने पर उदर में शूल होने लगता है। बेल का मुरब्बा खाकर, दूध पीने से कोष्ठबद्धता नष्ट होने पर उदर शूल भी नष्ट हो जाएगा।
  • बेल की गिरी का चूर्ण बनाकर, उसमें सोंठ, पाढ़, मोचरस, धाय के फूल, नागरमोथा का चूर्ण बनाकर, सबको मिलाकर 3 ग्राम चूर्ण मट्ठे के साथ सेवन करने से कोष्ठबद्धता के साथ उदर शूल भी नष्ट होता है।

जलोदर रोग । पेट में पानी भरना

Ascites

जलोदर रोग में उदर में इतना जल भर जाता है कि रोगी का उदर किसी घड़े की तरह फूला हुआ दिखाई देता है। उदर के अधिक फूल जाने और उसमें जल भर जाने के कारण भारीपन होने से रोगी को चलने-फिरने और कुर्सी पर बैठने में कठिनाई होने लगती है। रोगी बिस्तर पर लेटे रहना पसंद करता है।

Why does Ascites happens?

जलोदर क्यों होता है?

उत्पत्ति : चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अग्निमांद्य से पीडित स्त्री-पुरुष जब अधिक मात्रा में जल का सेवन करते हैं तो उनकी जठराग्नि नष्ट हो जाती है। ऐसे में क्लोम नलिका में उपस्थित वायु और स्रोतों के अवरोध के कारण जल मिश्रित कफ जलीय अंश की वृद्धि करके जलोदर की उत्पत्ति करते हैं।

वृक्कों (गुर्दों) की विकृति से जलोदर रोग की उत्पत्ति होती है।

अधिक शराब पीने वाले स्त्री-पुरुष जलोदर रोग से अधिक पीडित होते हैं, क्योंकि शराब पीने से यकृत (जिगर) में शोथ होता है।

यकृत की शिराओं में रक्त भर जाने, जल अंश के रिसने और उदर में एकत्र होने से जलोदर रोग होता है।

What are Symptoms of Ascites?

जलोदर के लक्षण क्या है?

लक्षण : जलोदर रोग में उदर फूल जाता है। उसको दबाकर देखने पर गड्ढा बन जाता है।

मूत्र अधिक मात्रा में निष्कासित होता है। नेत्रों में शोथ, त्वचा शिथिल, भोजन में अरुचि, शरीर के विभिन्न अंगों में सूजन के लक्षण दिखाई देते है।

रोगी अतिसार से पीडित होता है। शरीर का, त्वचा का रंग पीला-पीला दिखाई देता है।

Steps to cure Ascites.

चिकित्सा

  • बेल की गिरी सुबह-शाम खाने से पाचन क्रिया की क्षीणता नष्ट होती है तो जलोदर रोग की उत्पत्ति नहीं होती है।
  • बेल के ताजे व कोमल पत्तों को कूटकर, किसी कपडे में बांधकर उसका रस निकालें। 50 ग्राम बेल के पत्तों के रस में छोटी पिप्पली का दो ग्राम चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से जलोदर रोग नष्ट होता है। कुछ सप्ताह के सेवन से लाभ दिखाई देता है।

आंत्रकृमि । आंत के कीड़े । पेट के कीड़े

Helminth

आंत्रकृमि आंतों में चिपके रक्त चूसकर शरीर में रक्ताल्पता की विकृति उत्पन्न करते हैं। आंत्रकृमि विषक्रमण करके रक्त को दूषित करते हैं।

उदर में बड़े कृमि (केंचुए) होने से रोगी दिन-ब-दिन कमजोर होता चला जाता है।

Why does Helminth happens?

पेट के कीड़े क्यों होता है?

उत्पत्ति : दूषित और बासी खाद्य पदार्थों के सेवन से उदर में कृमि पहुंच जाते हैं।

आंत्रकृमि आंतों में चिपककर लम्बे समय तक रक्त चूसकर विषक्रमण करते हैं। आंत्रकृमियों के रक्त चूसने से आंतों में जख्म बन जाते हैं। दूषित जल पीने से उदर में कृमि होते हैं।

जब हरी सब्जियों और फलों को जल से साफ किए बिना काटकर खाया जाता है तो धूल-मिट्टी और दूषित जल के साथ आंत्रकृमि उदर में पहुंच जाते हैं।

उदर में पहुंचकर कृमि तेजी से विकसित होते हैं। केंचुए एक फुट से भी अधिक बड़े हो जाते हैं। केंचुए रक्तपान करके शरीर को निर्बल करते हैं।

What are Symptoms of Helminth?

पेट के कीड़े के लक्षण क्या है?

लक्षण : आंत्रकृमियों व दूसरे कृमियों द्वारा रक्त चूसने से शरीर पीला पडने लगता है। आंत्रकृमियों द्वारा विषक्रमण करने से जी मिचलाने, वमन होने के लक्षण दिखाई देते हैं। आंत्रकृमि होने पर रात्रि को मलद्वार पर बहुत खुजली होती है।

Steps to cure Helminth.

चिकित्सा

  • बेल की गिरी को सुखाकर चूर्ण बना लें। इसमें बराबर मात्रा में वायविडंग का चूर्ण मिला लें। सुबह-शाम 5-5 ग्राम चूर्ण जल के साथ सेवन करें। ऊपर से थोड़ा-सा गुड खा लें। आंत्रकृमि नष्ट होकर शौच के साथ निकल जाते हैं।
  • बेल की गिरी और काला नमक मिलाकर खाने से आंत्रकृमि व पेट के कीड़े मर जाते हैं।
  • बेल की गिरी और अनार के छिलकों को जल में उबालकर क्वाथ बनाएं। इस क्वाथ को छानकर पीने से आंत्रकृमि नष्ट होते हैं।
  • बेल के शर्बत में वायविडंग और अजवायन का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से कृमि नष्ट होते हैं।
  • बेल की गिरी के रस में काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

कोष्ठबद्धता । कब्ज

Constipation

किसी स्त्री-पुरुष का दो-तीन दिन तक शौच न जाना साधारण विकृति हो सकती है।

यदि इस साधारण विकृति की चिकित्सा न की जाए तो कुछ ही दिनों में यह कोष्ठबद्धता (कब्ज) अनेक भयंकर रोगों की उत्पत्ति कर देती है। कोष्ठबद्धता के चलते रोगी के पेट में भारीपन और दर्द होता है। उसे कुछ भी खाना अच्छा नहीं लगता।

Why does Constipation happens?

कब्ज क्यों होता है?

उत्पत्ति : भोजन में अधिक उष्ण, गरिष्ठ और शुष्क खाद्य पदार्थों का सेवन करने के फलस्वरूप मल के अधिक शुष्क और कठोर होने से कोष्ठबद्धता की उत्पत्ति होती है। .

चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार गरिष्ठ खाद्य पदार्थों के अधिक सेवन के कारण आंतों में पित्त का अभाव होने से मल शुष्क और कठोर हो जाता है तथा आंतों में एकत्र होकर कोष्ठबद्धता की उत्पत्ति करता है।

पाचन क्रिया की विकृति भी कोष्ठबद्धता की उत्पत्ति करती है।

सुबह देर तक बिस्तर पर सोते रहने वाले स्त्री-पुरुष जब आलस्य के कारण समय पर शौच नहीं जाते हैं तो आंतों में मल एकत्र होते रहने से कोष्ठबद्धता उत्पन्न होती है। कोष्ठबद्धता की चिकित्सा में विलम्ब करने से कष्टदायक रोग अर्श (बवासीर) की उत्पत्ति होती है।

What are Symptoms of Constipation?

कब्ज के लक्षण क्या है?

लक्षण : आंतों में मल के एकत्र होने से शूल होता है। रोगी मानसिक रूप से अधिक परेशान होता है। मल के कारण दूषित वायु (गैस) बनने पर रोगी को बहुत बेचैनी और घबराहट होती है। पेटदर्द और सिरदर्द होने लगता है। रोगी की भूख नष्ट हो जाती है।

पेट में हर समय भारीपन अनुभव होता है। रोगी रात को गहरी नींद नहीं सो पाता। कोष्ठबद्धता के कारण अजीर्ण, आध्मान (अफारा) और अनिद्रा की उत्पत्ति होती है।

Steps to cure Constipation.

चिकित्सा

  • बेल के कोमल व ताजे पत्तों का रस और काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से कोष्ठबद्धता नष्ट होती है।
  • बेल का मुरब्बा प्रतिदिन खाने और ऊपर से दूध पीने से कोष्ठबद्धता शीघ्र नष्ट होती है।
  • बेल का शर्बत पीने और बेलगिरी खाने से भी कोष्ठबद्धता का निवारण
  • होता है।
  • बेल फल खाते रहने से पाचक क्रिया जल्दी होने से कोष्ठबद्धता की
  • उत्पत्ति ही नहीं होती।
  • बेल के बीजों का तेल 1-2 ग्राम मात्रा में सेवन करने से कोष्ठबद्धता सरलता से नष्ट हो जाती है।
  • इमली को रात्रि के समय जल में डालकर रखें। प्रातः उठकर थोड़ा-सा मसलकर इमली के जल को छानकर, उसमें बेलगिरी का 10 ग्राम गूदा, दही और खांड मिलाकर सेवन करें। कुछ ही घंटों में कोष्ठबद्धता नष्ट होने लगेगी।

अर्श रोग । बवासीर

Hemorrhoids ~ Piles

अर्श रोग अर्थात बवासीर में मलद्वार से रक्तस्राव होने पर रोगी कुछ ही दिनों में बहुत कमजोर हो जाता है। अधिक रक्तस्राव होने से रोगी की मृत्यु की सम्भावना बन सकती है। इस रोग के कारण रोगी को बहुत पीडा होती है।

रोगी को कुर्सी व सोफे पर बैठने में बहुत कठिनाई होती है। स्कूटर व कार में यात्रा करना तो बहुत मुश्किल हो जाता है।

अर्श रोग में अत्यधिक पीडा के कारण रोगी रात को भी नहीं सो पाता।

Why does Piles happens?

बवासीर क्यों होता है?

उत्पत्ति : अर्श रोग की उत्पत्ति पेट की खराबी के कारण होती है।-पाचन क्रिया विकृत होने पर जब कोष्ठबद्धता (कब्ज) होती है और स्त्री-पुरुष उस कोष्ठबद्धता को नष्ट करने की कोशिश नहीं करते हैं तो मल के अधिक शुष्क और कठोर हो जाने से अर्श रोग की उत्पत्ति होती है।

चिकित्सकों के अनुसार ऊंट व घोड़े पर अधिक सवारी करने, साइकिल चलाने से भी अर्श रोग हो सकता है।

आयुर्वेद चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार कटु, अम्ल, लवण, विदाही, तीक्ष्ण और उष्ण खाद्य पदार्थों के अधिक सेवन से पाचन क्रिया विकृत होने पर अर्श रोग की उत्पत्ति हो सकती है।

वायु, मल, मूत्र आदि वेगों को अधिक समय तक धारण करने अर्थात रोकने से भी अर्श रोग की उत्पत्ति हो सकती है।

What are Symptoms of Hemorrhoids?

बवासीर के लक्षण क्या है?

लक्षण : अर्श रोग में जब मल अत्यंत कठोर और शुष्क हो जाता है तो उसके निष्कासन के लिए बहुत जोर लगाना पड़ता है।

कठोर मल से गुदा में व्रण (जख्म) बन जाते हैं। मलद्वार पर मांसांकुरों (मस्से) की उत्पत्ति होती है, फिर उन मांसांकुरों से रक्तस्राव होने लगता है। मांसांकुरों में शोथ (सृजन) होने से रोगी को बहुत पीडा होती है।

अधिक रक्तस्राव होने से रोगी बहुत निर्बल हो जाता है। रोगी के शरीर में रक्त की अत्यधिक कमी हो जाती है। शारीरिक क्षीणता के कारण रोगी का चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है।

Steps to cure Piles.

चिकित्सा

  • अर्श रोग में रक्तस्राव की विकृति को नष्ट करने के लिए सबसे पहले कोष्ठबद्धता को नष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए। कोष्ठबद्धता को बेलगिरी के मुरब्बे के सेवन से सरलता से नष्ट किया जा सकता है।
  • बेलगिरी का मुरब्बा खाकर ऊपर से दूध पीने से कोष्ठबद्धता शीघ्र नष्ट होती है। कोष्ठबद्धता नष्ट होने से शौच के समय जोर नहीं लगाना पड़ता। मल सरलता से निकल जाता है तो रक्तस्राव भी नहीं होता।
  • बेलगिरी के गूदे को सुखाकर, उसे कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में बराबर मात्रा में त्रिफला चूर्ण मिलाकर रखें। रात्रि को सोते समय 5 ग्राम चूर्ण हल्के गर्म जल या दूध के साथ सेवन करने से कोष्ठबद्धता नष्ट होती है। अर्श रोग में रक्तस्राव में अवरोध होता है।
  • प्रतिदिन बेल की गिरी खाने से पाचन क्रिया तीव्र होने से अर्श रोग में बहुत लाभ होता है।
  • बेल की जड का कोमल भाग सिल पर पीसकर, उसमें मिश्री मिला लें। 5 ग्राम मात्रा में इस मिश्रण को भोजन से पहले सेवन करने से अर्श रोग में रक्तस्राव नहीं होता। भोजन में उष्ण मिर्च-मसालों के खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। चाय-कॉफी भी अर्श रोगी को अधिक हानि पहुंचाती है।
  • कच्चे बेल की गिरी (गूदा) सोंठ और सौंफ मिलाकर जल में देर तक उबालकर क्वाथ बनाएं। बेल की गिरी 10 ग्राम, सौंफ और सोंठ 5-5 ग्राम मिलाकर क्वाथ बनाएं। क्वाथ को. छानकर सुबह-शाम पीने से रक्तस्राव की विकृति जल्दी नष्ट होती है।
  • बेल की पत्तियों को सुखाकर, उन्हें मिट्टी के किसी पात्र में रखकर आग पर गर्म करके जला लें। जली हुई पत्तियों को पीसकर मधु मिलाकर चाटकर खाने से अर्श रोग में रक्तस्राव विकृति नष्ट होती है।
  • प्रतिदिन बेल का फल खाने से पाचन क्रिया संतुलित रहती है तो कोष्ठबद्धता की विकृति नहीं होती। इससे अर्श रोग से सुरक्षा होती है।

कामला । पीलिया । जांडिस

Jaundice

कामला रोग अर्थात पीलिया की उत्पत्ति पित्तवाहिनी के मार्ग में अवरोध होने से होती है। यकृत और पित्ताशय से निकलने वाली पित्त वाहिनियों के मिलने की जगह पर भी यह अवरोध हो सकता है। इस विकृति में रक्त पित्त से मिलने लगता है और शरीर की त्वचा का रंग पीला होने लगता है।

Why does Jaundice happens?

पीलिया क्यों होता है?

उत्पत्ति : महर्षि चरक के अनुसार पांडु रोग (रक्ताल्पता) में जब कोई मनुष्य अधिक मात्रा में पित्तकारक, अम्लीय, चटपटे, उष्ण मसालों से निर्मित खाद्य पदार्थों का सेवन करता है तो उसके शरीर में पित्त कुपित्त होकर रक्त मांस को दूषित करके कामला रोग की उत्पत्ति करता है। आधुनिक चिकित्सकों के अनुसार किसी रोग विकार के कारण जब रक्त के लाल कण तीव्र गति से नष्ट होते हैं और इसके परिणामस्वरूप रक्ताल्पता (एनीमिया) की उत्पत्ति होती है तो उसके साथ कामला रोग भी हो जाता है, क्योंकि रक्त कणों के अधिक नष्ट होने से पित्त का अधिक निर्माण होता है। अधिक मात्रा में पित्त रक्त में मिलकर कामला रोग की उत्पत्ति करता है। रक्त कणों में जन्मजात विकृति होने से रक्त कणों के तेजी से नष्ट होने पर शिशु को कामला हो जाता है।

What are Symptoms of Jaundice?

पीलिया के लक्षण क्या है?

लक्षण : कामला रोग होने पर रोगी के चेहरे पर पीले रंग के लक्षण दिखाई देते हैं। कुछ दिनों में सारे शरीर की त्वचा का रंग पीला होता है। रोगी के नेत्रों की श्लैष्मिक कला, नाखून, पसीना और मूत्र आदि भी पीले हो जाता हैं। रोगी स्त्री के स्तनों से भी पीले रंग का दूध निकलता है। चिकित्सा में विलम्ब होने से शरीर में तीव्र खुजली होती है और रोगी को कब्ज हो जाती है।

Steps to cure Jaundice.

चिकित्सा

  • बेल के शर्बत में जवाखार और कलमी शोरा मिलाकर पीने से पीलिया रोग में बहुत लाभ होता है।
  • गन्ने के रस में बेल की गिरी का रस मिलाकर पीने से पीलिया रोग नष्ट होता है।
  • बेल के मुरब्बे में नीम के कोमल, ताजे पत्तों का 5 ग्राम रस मिलाकर सेवन करने से पीलिया रोग का निवारण होता है। दिन में दो-तीन बार इसका सेवन करें।
  • बेल की कोपलों को कूट-पीसकर, किसी कपडे में बांधकर 50 ग्राम रस निकालें। रस को कांच के पात्र में रखें। स्टील के पात्र में अधिक देर रखने से रस के गुणकारी तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। उक्त रस में काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम पीने से पीलिया नष्ट होता है।

अतिसार | संग्रहणी | जुलाब

Diarrhea

दूषित व बासी भोजन खाने से पाचन क्रिया विकृत होने पर अतिसार अर्थात दस्त हो सकते हैं। अतिसार में बार-बार शौच जाने से शरीर में जल की कमी हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप रोगी बहुत कमजोर हो जाता है। अतिसार के चलते रोगी जो कुछ भी खाता है तुरंत उसे शौच के लिए दौडना पड़ता है।

Why does Diarrhea happens?

जुलाब क्यों होता है?

उत्पत्ति : पाचन क्रिया की विकृति के कारण अतिसार की उत्पत्ति होती है। वर्षा ऋतु में कुएं व हैंड-पंप का दूषित जल पीने से अति शीघ्र अतिसार होता है।

तेल-मिर्च व अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थों के अधिक मात्रा में सेवन करने से अतिसार की उत्पत्ति होती है।

अधिक मात्रा में घी, मक्खन का सेवन करने से भी किशोर अतिसार से पीडित होते हैं।

What are Symptoms of Diarrhea?

जुलाब के लक्षण क्या है?

लक्षण : अतिसार के रोगी को बार-बार शौच के लिए जाना पड़ता है। जल के रूप में शौच होती है। रोगी को कुछ खाते-पीते ही शौच के लिए जाना पड़ता है।

अतिसार से शरीर में जल की कमी हो जाने से रोगी की हालत खराब हो जाती है। ऐसी स्थिति में रोगी को तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ जाता है।

Steps to cure Diarrhea.

चिकित्सा

  • कच्चे बेल को गर्म राख या गर्म रेत में दबाकर भून लें। राख से निकालकर, ऊपर से बेल को अच्छी तरह साफ करके, उसका गूदा निकाल लीजिए। इस गूदे में मिश्री मिलाकर खाने से अतिसार में बहुत लाभ होता है।
  • कच्चे बेल की गिरी को अलग करके सुखा लें। फिर उस गिरी को कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इस चुनै को ताजे जल के साथ सेवन करने से अतिसार की विकृति नष्ट होती है। चूर्ण का दिन में दो.:तीन बार सेवन अवश्य करें।
  • बेल की गिरी 20 ग्राम और गुड 10 ग्राम मात्रा में मिलाकर थोडे-से जल के साथ सेवन करने से अतिसार रोग नष्ट होता है।
  • अतिसार के साथ वमन की विकृति होने पर बेल की गिरी और आम की गुठली की गिरी (बिजली) को 5-5 ग्राम मात्रा में पीसकर, मधु और मिश्री मिलाकर सेवन करने से अतिसार बंद होता है। दिन में दो-तीन बार अवश्य सेवन करें।
  • बेल की 10 ग्राम गिरी को सौंफ के अर्क के साथ पीसकर सेवन से हरे, पीले अतिसार की विकृति में बहुत लाभ होता है। दिन में दो-तीन बार पिला सकते हैं। ३
  • बेल की 10 ग्राम गिरी और आम की गुठली के भीतर की 5 ग्राम गिरी को थोड़ा-सा पीसकर चावल के धोवन (जल) के साथ सेवन कराने से अतिसार की विकृति नष्ट होती है।

आंतों की विकृति

Bowel Disease

कोष्ठबद्धता के कारण मल शुष्क और कठोर होकर आंतों में एकत्र होता रहता है तो आंतों को बहुत हानि पहुंचती है। मल के एकत्र होने से आंतों की अनेक विकृतियों की उत्पत्ति होती है।

Why does Bowel Disease happens?

आंतों की विकृति क्यों होता है?

उत्पत्ति : अधिक उष्ण मिर्च-मसालों व अम्ल रसों से बने खाद्य पदार्थों का सेवन करने से उदर में अम्लता की अधिक मात्रा होने से आंतों को हानि पहुंचती है।

अम्लता की अधिकता के कारण आंतों में व्रण भी बन जाते हैं। मल के एकत्र होने से आंतों में सड़न होती है।

शुष्क मल कठोर हो जाता है। उसका निष्कासन नहीं हो पाता। मल के निष्कासन के लिए रोगी को बहुत जोर लगाना पड़ता है।

What are Symptoms of Bowel Disease?

आंतों की विकृति के लक्षण क्या है?

लक्षण : आंतों में विकृति के कारण भारीपन की शिकायत होती है। रोगी हर समय बेचैनी अनुभव करता है। दूषित वायु की उत्पत्ति होती है। दूषित वायु (गैस) के बनने से सिर चकराता है।

रोगी को अधिक घबराहट होती है। शारीरिक निर्बलता तेजी से बढ़ती है और रोगी को हर समय आलस्य घेरे रहता है। भूख नष्ट हो जाती है।

Steps to cure Bowel Disease.

चिकित्सा

  • बेल की गिरी को प्रतिदिन खाने से कोष्ठबद्धता नष्ट होने से आंतों से मल निकल जाता है। आंतों की विकृति का निवारण होता है।
  • बेल का शर्बत सुबह-शाम पीने से कोष्ठबद्धता नष्ट होती है। शर्बत पीने से पाचन क्रिया भी तीव्र होती है। भोजन सरलता से पचता है।
  • बेल का शर्बत पीने से आंतों का शोथ नष्ट होता है।
  • बेल के ताजे व कोमल पत्तों का रस निकालकर 10 ग्राम रस में थोड़ी-सी मिश्री मिलाकर पीने से आंतों में जलन नष्ट होती है।
  • बेल की गिरी में दूध की मलाई अच्छी तरह से मिलाकर मिश्रण बना लें। इस मिश्रण को 10 ग्राम मात्रा में प्रातःकाल और 10 ग्राम मात्रा में . सायंकाल खाने से आंतों की विकृति नष्ट होती है।
  • बेल की गिरी 50 ग्राम मात्रा में लेकर मिक्सी में पीसकर, उसमें जल मिलाकर थोड़ी-सी मिश्री डालकर शर्बत की तरह पीने से आंतों का मल सरलता से निष्कासित होता है। आंतों की अनेक विकृतियां नष्ट होती हैं।
  • बेल का फल खाने से आंतों की शुष्कता नष्ट होती है।
  • बेल का मुरब्बा खाने से आंतों की उष्णता व जलन नष्ट होती है।

अम्ल पित्त । कलेजे की जलन

Acidity

अम्लपित्त की विकृति से रोगी के गले और छाती में इतनी तीव्र जलन होती है कि रोगी बहुत विचलित हो उठता है। उसे खाने-पीने की कोई चीज अच्छी नहीं लगती। हर समय उसके मुंह में कड़वापन बना रहता है। इस विकृति को अम्लपित्त रोग अर्थात बदहजमी कहते हैं। 23

Why does Acidity happens?

कलेजे की जलन क्यों होता है?

उत्पत्ति : भोजन में विदाही पदार्थ अर्थात उड़द और मैदा से बने खाद्य पदार्थों व अत्यधिक उष्ण, स्निग्ध, रुक्ष, अम्लीय, कुलथी से बने खाद्य पदार्थों के सेवन से पित्त में अम्ल गुण की अति वृद्धि होने से अम्लपित्त की उत्पत्ति होती है। हर समय कुछ-न-कुछ खाने की आदत, अजीर्ण रोग होने पर भोजन करने, दूषित और बासी भोजन करने, शीतऋतु में दिन में अधिक सोने, अधिक स्नान करने से पित्त कुपित्त होकर अम्लपित्त की उत्पत्ति करता है।

अम्लपित्त की विकृति वर्षा ऋतु में अधिक होती है, क्योंकि वर्षा ऋतु में वातावरण में अधिक आर्द्रता (नमी) होने के कारण पाचन शक्ति से पित्त अधिक मात्रा में शोषित होकर अम्लपित्त की उत्पत्ति करता है।

अधिक क्रोध करने, अधिक लवणयुक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करने, धूप में बैठने, तिल, दही, शराब, अचार आदि का अधिक सेवन करने वाले स्त्री-पुरुष अम्लपित्त से अधिक पीडित होते हैं।

What are Symptoms of Acidity?

अम्ल पित्त के लक्षण क्या है?

लक्षण : अम्लपित्त होने पर रोगी को खट्टी और कड़वी डकारें आती हैं। गले और छाती में तीव्र जलन होती है। रोगी बेचैन हो जाता है। अम्लपित्त की चिकित्सा में विलम्ब और भोजन में लापरवाही से रोग विकसित होने पर उदर में भारीपन, हृदय में जलन, अधिक कड़वी डकारें, सिर में दर्द, आमाशय के ऊपरी भाग में शूल, जी मिचलाने, अधिक ग्लानि, शारीरिक शिथिलता, आलस्य और बेचैनी के लक्षण दिखाई देते है। भोजन की पाचन क्रिया नहीं हो पाने से रोगी को अधिक परेशानी होती है।

Steps to cure Acidity.

चिकित्सा

  • अम्लपित्त की चिकित्सा प्रारम्भ करने से पहले रोगी को उष्ण मिर्च-मसालों व अम्लीय रसों से बने खाद्य पदार्थों का सेवन बंद कर देना चाहिए। रोगी को चाय, कॉफी से भी परहेज करना चाहिए।
  • कोष्ठबद्धता होने से अम्लपित्त में अधिक जलन व पीडा होती है। बेल का मुरब्बा खाने व बेल का शर्बत पीने से कोष्ठबद्धता नष्ट होने पर अम्लपित्त का निवारण होता है।
  • 3 ग्राम जीरा और 3 ग्राम धनिया पीसकर उसे बेल के शर्बत में मिलाकर पीने से अम्लपित्त की विकृति नष्ट होती है। दिन में दो-तीन बार सेवन करें।
  • कोष्ठबद्धता नष्ट करने के बाद बेल के रस में मिश्री मिलाकर पीने से भी अम्लपित्त की विकृति नष्ट होती है। बेल के शर्बत में भी मिश्री मिलाकर पीने से लाभ होता है।
  • बेल के 10 ग्राम ताजे व कोमल पत्तों को जल के साथ पीसकर, 50 ग्राम जल में घोलकर, छानकर, उसमें मिश्री मिलाकर पीने से अम्लपित्त की विकृति नष्ट होती है।

गुल्म । वायु गोला

GAS

गुल्म रोग में उदर में वायु का गोला बनता है। वायु गोले से उदर में तीव्र शूल होता है। जब वायु गोले का निष्कासन नहीं हो पाता है तो गोला श्वास मार्ग तक पहुंचकर रोगी के श्वास लेने में अवरोध उत्पन्न कर देता है। वायु ‘गोले के कारण तीव्र शूल से रोगी तड़प उठता है।

Why does Gas happens?

वायु गोला क्यों होता है?

उत्पत्ति : उदर विकार में अनियमित भोजन करने से पाचन क्रिया की विकृति के कारण गुल्म रोग (वायु गोले) की उत्पत्ति होती है।

शीतल खाद्य पदार्थों की अधिकता भी गुल्म रोग उत्पन्न करने में सहायता करती है।

What are Symptoms of Gas?

वायु गोला के लक्षण क्या है?

लक्षण : वायु का गोला उदर में किसी एक जगह स्थित नहीं रहता है।

गोले के इधर-उधर चलने और श्वास मार्ग अवरुद्ध करने से बहुत पीडा होती है।

Steps to cure Gas.

चिकित्सा

  • 50 ग्राम बेल की गिरी में 10 ग्राम गुड मिलाकर खाने से गुल्म की विकृति में बहुत लाभ होता है।

 

अग्निमांद्य

Dyspepsia

अनियमित और उष्ण मिर्च-मसालों के सेवन से अग्निमांद्य की विकृति में पाचन क्रिया क्षीण हो जाती है।

ऐसे में जठराग्नि के क्षीण होने की विकृति को अग्निमांद्य कहते हैं।

Why does Dyspepsia happens?

अग्निमांद्य क्यों होता है?

उत्पत्ति : शारीरिक शक्ति से अधिक परिश्रम करने, भोजन करते ही व्यायाम या भारी काम करने, भोजन के बीच अधिक जल पीने से अग्निमांद्य की विकृति होती है। अधिक मात्रा में भोजन करने और अधिक उपवास करने से भी पाचन क्रिया क्षीण होती है। अनियमित भोजन करने व रात्रि में देर तक जागरण करने से अग्निमांद्य की उत्पत्ति होती है। मल-मूत्र के वेगों को देर तक रोकने से भी अग्निमांद्य की विकृति हो सकती है।

What are Symptoms of Dyspepsia?

अग्निमांद्य के लक्षण क्या है?

लक्षण : अग्निमांद्य में रोगी को भूख कम लगती है। रोगी जो कुछ खाता-पीता है उसकी पाचन क्रिया नहीं होती। ऐसे में उसे उदर में भारीपन अनुभव होता है। हृदय पर बोझ-सा अनुभव होता है।

उत्कलेश (जो मिचलाने) के लक्षण दिखाई देते हैं। रोगी को खट्टी डकारें आती हैं। कभी-कभी उदर में आध्मान (अफारा) की शिकायत होती है।

Steps to cure Dyspepsia.

चिकित्सा

  • बेल के गूदे में इमली को जल में भिगोकर, हाथ से मसलकर मिला लें। इस गूदे को छानकर दही की लस्सी में मिलाकर सेवन करने से पाचन शक्ति प्रबल होती है। कुछ ही दिनों में अग्निमांद्य की विकृति नष्ट हो जाती है।
  • बेल का शर्बत पीने से अग्निमांद्य में बहुत लाभ होता है।
  • बेल की 100 ग्राम गिरी लेकर उसमें थोड़ा-सा काला नमक और 10 ग्राम शक्कर (चीनी नहीं) मिलाकर मिक्सी में चलाकर, उसमें जल मिलाकर, छानकर सुबह-शाम सेवन करें। इससे पाचन क्रिया प्रबल होने से अग्निमांद्य की विकृति नष्ट होती है।
  • बेल का मुरब्बा खाने से कोष्ठबद्धता नष्ट होती है और पाचन क्रिया प्रबल होती है। पाचन क्रिया प्रबल होने से अग्निमांद्च का निवारण होता है।

प्रवाहिका । पेचिश

Bloody Flux ~ Dysentery

वर्षा ऋतु में दूषित जल पीने से अधिकांश स्त्री-पुरुष, बच्चे व प्रौढ़ प्रवाहिका अर्थात पेचिश के शिकार हो जाते हैं। प्रवाहिका में रोगी को बार-बार शौच के लिए दौडना पड़ता है। शौच अतिसार के रूप में होती है। प्रवाहिका रोग में आंतों में तीव्र पीडा होती है। ऐंठन की पीडा से रोगी को बहुत कष्ट होता है। ऐंठन (मरोड) की पीडा से प्रवाहिका की पहचान होती है।

Why does Bloody Flux happens?

प्रवाहिका क्यों होता है?

उत्पत्ति : एलोपैथी चिकित्सकों के अनुसार प्रवाहिका की उत्पत्ति दूषित जल में मिले बेसिलस, अमीबा जीवाणु के कारण होती है। प्रवाहिका के रोगी जब खुले मैदानों, नदी-तालाब के किनारों पर शौच करते हैं तो मक्खियां रोग के जीवाणुओं को दूसरे लोगों के घरों तक पहुंचा देती हैं। कटे हुए फल व खुले खाद्य पदार्थों पर बैठकर मक्खियां उन्हें दूषित कर देती हैं। फल-सब्जियों को स्वच्छ किए बिना खाने से प्रवाहिका रोग बहुत जल्दी होता है, क्योंकि खेतों की मिट्टी से प्रवाहिका के जीवाणु उन फल-सब्जियों से लग जाते हैं। गंदे होटल व रेस्तरां में भोजन करने से भी प्रवाहिका की विकृति होती है।

What are Symptoms of Dysentery?

पेचिश के लक्षण क्या है?

लक्षण : प्रवाहिका रोग में तीव्र ऐंठन के साथ अतिसार (दस्त) होता है। नाभि के आसपास शूल की उत्पत्ति होती है। अतिसार में दुर्गन्धयुक्त मल निकलता है।

जीवाणुओं के संक्रमण से आंतों में जख्म होने पर शौच के साथ रक्त निकलने लगता है। आंव की भी उत्पत्ति होती है। कुछ खाते-पीते ही पेट में ऐंठन होने लगती है।

Steps to cure Dysentery.

चिकित्सा

  • प्रवाहिका रोग में ऐंठन, मरोड की विकृति रोगी को बेचैन कर देती है। ऐसे में बेलगिरी खाने से बहुत लाभ होता है। बेलगिरी के गुणकारी तत्व रोग के जीवाणुओं को नष्ट करके, पाचन क्रिया को प्रबल करते है।
  • प्रवाहिका के रोग में अतिसार के कारण शरीर में जल की कमी हो जाने से प्यास बहुत लगती है। बेल का शर्बत पीने से प्यास शांत होती है और शर्बत से प्रवाहिका का प्रकोप कम होता है।
  • बेल की गिरी (गूदे) को मक्खन या मलाई मिलाकर खिलाने से आंव-मरोड की विकृति शीघ्र नष्ट होती है। सुबह-शाम इसका सेवन करने से शीघ्र लाभ होता है।
  • बेल के कच्चे फल को गर्म राख या गर्म रेत में दबाकर भून लें। फिर उस फल को ऊपर से साफ करके, कूट-पीसकर रस निकालें। इस रस में मिश्री मिलाकर दिन में दो-तीन बार सेवन करने से प्रवाहिका रोग में ऐंठन मरोड़ की विकृति नष्ट होती है। बेल आंव का निर्माण बंद करती है।
  • बेल की गिरी में पुराना गुड मिलाकर खाने से अतिसार के साथ रक्त निकलने की विकृति नष्ट होती है।
  • प्रवाहिका रोग में बेल की गिरी और आम के गुठली के भीतर की गिरी (बिजली) को सुखाकर बनाए चूर्ण से बहुत लाभ होता है। बेल और आम की गुठली की गिरी को बराबर-बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को उबले चावल के जल (मांड) के साथ सेवन करने से शीघ्र प्रवाहिका का रोग नष्ट होता है। दिन में दो-तीन बार अवश्य सेवन करें।
  • बेलगिरी, भुनी हुई सौंफ, सूखा हुआ धनिया और मिश्री सभी बराबर-बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में बराबर-बराबर मात्रा में सोंठ और सौंफ (बिना भुनी) का चूर्ण बनाकर मिला लें। इस चूर्ण को 5-5 ग्राम की मात्रा में दिन में तीन-चार बार हल्के उष्ण जल के साथ सेवन करने से प्रवाहिका का अंत होता है।
  • प्रवाहिका के रोगी को चाय-कॉफी का बिल्कुल सेवन नहीं करना चाहिए। घी, तेल व अम्लीय रस और उष्ण मिर्च-मसालों से बने व्यंजन भी हानि पहुंचाते हैं। चावल 1 भाग व मूंग की दाल 2 भाग की पतली खिचड़ी दही के साथ खाने से बहुत लाभ होता है। रोगी को जल उबालकर सेवन करना चाहिए।

अतिसार | संग्रहणी | जुलाब

Diarrhea

बार-बार अतिसार की विकृति होने से पाचन क्रिया इतनी बिगड़ जाती है कि फिर जल्दी-जल्दी पतले दस्त होने लगते हैं।

बहुत कोशिशों के बाद भी उन दोस्तों को रोका नहीं जा सकता। इस विकृति को ‘ संग्रहणी ‘ कहा जाता है।

Why does Diarrhea happens?

जुलाब क्यों होता है?

उत्पत्ति : संग्रहणी रोग की उत्पत्ति अतिसार में अधिक उष्ण मिर्च-मसालों व अम्लीय रसों से बने खाद्य पदार्थों के सेवन से संग्रहणी होती है। कुछ लोग खूब पौष्टिक, घी, तेलों से बने खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं, लेकिन कोई परिश्रम का काम नहीं करते। व्यायाम भी नहीं करते। ऐसे लोग संग्रहणी से पीडित होते हैं।

What are Symptoms of Diarrhea?

जुलाब के लक्षण क्या है?

लक्षण : संग्रहणी में बार-बार अतिसार (दस्त) होते हैं। कुछ खाते ही रोगी को शौच के लिए दौडना पड़ता है। शारीरिक रूप से रोगी बहुत निर्बल हो जाता है।

कुछ काम करते, सीढ़ियां चढ़ते हुए रोगी का शरीर पसीने से भीग जाता है। बहुत जोरों से हृदय धड़कता है। नेत्रों के आगे अंधेरा छा जाता है।

Steps to cure Diarrhea.

चिकित्सा

  • संग्रहणी की चिकित्सा में रोगी को सबसे पहले अपने भोजन पर नियंत्रण रखना चाहिए। भोजन में घी, तेल, मक्खन से बने उष्ण मिर्च-मसालों के खाद्य पदार्थों का बिल्कुल सेवन नहीं करना चाहिए। चिकित्सक द्वारा बताए गए खाद्य पदार्थों का ही सेवन करना चाहिए।
  • संग्रहणी में बेलगिरी खाने से बहुत लाभ होता है। बेल की गिरी (गूदे) में सोंठ का 3 ग्राम चूर्ण मिलाकर सेवन करने से अतिसार में नियंत्रण होता है। दिन में तीन बार बेल की गिरी और सोंठ का सेवन करना चाहिए।
  • बेल की गिरी, अतीस, गिलोय, सोंठ और नागरमोथा, सभी चीजें बराबर-बराबर मात्रा में लेकर, हल्का-सा कूटकर, 10 ग्राम चूर्ण को जल में उबालकर क्वाथ बनाएं। इस क्वाथ को छानकर पीने से संग्रहणी में बहुत लाभ होता है।
  • बेल की गिरी को छाया में सुखाकर, कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 3-3 ग्राम की मात्रा में तक्र (मट्ठे) के साथ दिन में दो-तीन बार सेवन करें। संग्रहणी में बहुत जल्दी लाभ होता है।
  • बेल के शर्बत में भुने हुए जीरे का 2 ग्राम चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम पीने से बहुत लाभ होता है।


विसूचिका ।  हैजा

Cholera

ग्रीष्म ऋतु में दूषित जल पीने व दूषित खाद्य पदार्थों के सेवन से कोई भी स्त्री-पुरुष व प्रौढ़ विसूचिका का शिकार हो सकता है।

विसूचिका में रोगी को निरंतर वमन होने से शरीर में जल की कमी से प्राणघातक स्थिति बन जाती है।

Why does Cholera happens?

हैजा क्यों होता है?

उत्पत्ति : चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार विसूचिका अर्थात हैजे की उत्पत्ति कालरा वायब्रो जीवाणुओं से होती है। दूषित, खुली रखी चीजों व दूषित जल के साथ शरीर में पहुंचकर बहुत जल्दी विसूचिका की उत्पत्ति करते हैं।

What are Symptoms of Cholera?

हैजा के लक्षण क्या है?

लक्षण : विसूचिका में रोगी को वमन के साथ अतिसार (दस्त) की विकृति भी होती है।

वमन और अतिसार से कुछ ही घंटों में रोगी के शरीर में जल की इतनी कमी हो जाती है कि रोगी मृत्यु के कगार पर पहुंच जाता है। अतिसार में रोगी को मरोड की पीडा भी होती है। रोगी अधिक निर्बल होकर बिस्तर पर लेट जाता है।

Steps to cure Cholera.

चिकित्सा

  • बेलगिरी, गिलोय, जायफल, कपूर और छुहारा, सभी चीजें 10-10 ग्राम मात्रा में लेकर कूट-पीसकर रखें। इस चूर्ण को शीशे की शीशी में अच्छी तरह ढक्कन लगाकर रखें। विसूचिका की शिकायत होने पर 10 ग्राम चूर्ण लेकर, जल में उबालकर क्वाथ बनाएं। इस क्वाथ को विसूचिका के रोगी को थोड़ा-थोड़ा पिलाने से वमन और अतिसार बंद होते हैं।
  • बेल की गिरी और मुनक्का को पीसकर चटनी बना लें। इस चटनी को विसूचिका के रोगी को चटाने से बहुत लाभ होता है।
  • बेल की गिरी को जल में उबालकर क्वाथ बनाकर उसमें मधु मिलाकर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पिलाने से वमन विकृति नष्ट होती है।

वमन विकृति । उलटी

Vomiting

दूषित, बासी खाद्य-पदार्थ, सड़े-गले फल-सब्जी का सेवन करने के कारण पाचन क्रिया विकृत होने से वमन विकृति हो जाती है। .

वमन विकृति में कुछ देर पहले खाए-पिए सभी पदार्थ वमन (उल्टी) द्वारा मुंह से बाहर निकल जाते हैं। वमन से रोगी को बहुत बेचैनी और घबराहट होती है।

Why does Vomiting happens?

उलटी क्यों होता है?

उत्पत्ति : शीत ऋतु में शीतल खाद्य पदार्थों का सेवन करने से वमन विकृति बहुत होती है। शीतल वातावरण में घूमने-फिरने से और नंगे पांव फर्श पर चलने से वमन होने लगती है। गर्भावस्था में स्त्रियाँ वमन से बहुत परेशान होती हैं। छोटे बच्चों को काली खांसी व दूसरे रोगों में वमन की शिकायत होती है।

अम्लपित्त रोग में बहुत वमन होती है। अधिक दिनों तक कब्ज की विकृति बनी रहे तो उदर में मल सड़ने पर दुर्गन्ध के कारण वमन होने लगती है।

What are Symptoms of Vomiting?

उलटी के लक्षण क्या है?

लक्षण : वमन में पेट का अधपचा भोजन मुंह के द्वारा तेजी से बाहर निकलता है। निरंतर वमन विकृति होने से रोगी घबरा जाता है। अम्लपित्त रोग में जब वमन होती है तो हरे, पीले, नीले व लाल रंग का पित्त मिला द्रव निकलता है।

वमन के कारण मुंह कड़वा हो जाता है। गले में जलन होती है।

Steps to cure Vomiting.

चिकित्सा

  • बेल के शुष्क फूल 3 ग्राम मात्रा में लेकर 100 ग्राम जल में डालकर रखें। दो-तीन घंटे बाद फूलों को थोड़ा-सा मसलकर जल को छानकर, उसमें मिश्री मिलाकर सेवन करें। वमन विकृति तुरंत नष्ट होगी। जल को थोड़ा-थोड़ा करके पीना चाहिए।
  • बेल की गिरी को पीसकर चावल के पानी के साथ सेवन करने से गर्भावस्था में होने वाली वमन विकृति नष्ट होती है।
  • बेल का शर्बत पीने से वमन विकृति में बहुत लाभ होता है।
  • बेल की गिरी को मिक्सी में पीसकर, जल में मिलाकर, छानकर थोड़ा-थोड़ा पीने से वमन बंद होती है।
  • बेल की गिरी को जल में उबालकर क्वाथ बनाएं। इस क्वाथ में मधु मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पीने से वमन बंद होती है।


मुंह के छाले

Mouth Ulcer

मुंह में छाले होने से रोगी को कुछ भी खाते-पीते समय बहुत जलन होती है। मिर्च-मसालों से खाद्य-पदार्थों के खाने पर तीव्र जलन होने से रोगी बेचैन हो उठता है। ‘ है

Why does Mouth Ulcer happens?

मुंह के छाले क्यों होता है?

उत्पत्ति : मुंह से छालों की विकृति पाचन क्रिया खराब होने से होती है।

कोष्ठबद्धता (कब्ज) के रोगी मुंह में छालों से बहुत पीडित होते है।

अधिक उष्ण खाद्य पदार्थों, चाय, काफी का अधिक सेवन करने वाले मुंह के छालों के शिकार अधिक होते हैं। चिकित्सकों के अनुसार मांस, मछली, उष्ण मसालों व तेल-मिर्च के खाद्य पदार्थों के सेवन से मुंह में छाले अधिक होते हैं।

What are Symptoms of Mouth Ulcer?

मुंह के छाले के लक्षण क्या है?

लक्षण : मुंह में नन्हे लाल, सफेद रंग के दाने उभर आते हैं। छाले जीभ व गले में भी होते हैं। कुछ ही दिनों में इन दानों में तीव्र जलन होने लगती

है। मुंह में छाले होने पर शीघ्र कोष्ठबद्धता (कब्ज) को नष्ट न किया जाए तो छालों में शोथ होने से पूय भी निकलने लगती है।

Steps to cure Mouth Ulcer.

चिकित्सा

  • मुंह के छालों की विकृति के निवारण के लिए सबसे पहले कोष्ठबद्धता को नष्ट करना चाहिए। कोष्ठबद्धता नष्ट होने से छाले गायब होते चले जाते हैं। बेल का मुरब्बा खाने से कोष्ठबद्धता नष्ट होती है और मुंह के छालों से मुक्ति मिलती है।
  • बेल का शर्बत भी कोष्ठबद्धता को नष्ट करके मुंह के छालों से मुक्ति दिलाता है।
  • बेल की गिरी को सुखाकर, कूटकर बारीक चूर्ण बनाएं। 10 ग्राम चूर्ण में 5 ग्राम कत्था, 4 दाने छोटी इलायची मिलाकर, कूट-पीसकर खूब बारीक चूर्ण बनाकर, कपडे से छान लें। इस चूर्ण को छालों पर बुरककर कुछ देर लार टपकाएं। दिन में एक-दो बार ऐसा करने से छालों से मुक्ति मिलती है।
  • प्रतिदिन बेल का मुरब्बा खाने से मुंह में छाले नहीं होते, क्योंकि बेल का मुरब्बा शरीर की उष्णता को नष्ट करता है।
  • बेल के 5 ग्राम चूर्ण में 5 ग्राम त्रिफला का चूर्ण मिलाकर हल्के गर्म जल के साथ रात्रि के समय सेवन करने से कोष्ठबद्धता नष्ट होती है।
  • बेल के गूदे को जल में उबालकर, छानकर कुल्ले करने से मुंह के छाले नष्ट होते हैं।

मधुमेह रोग । डायबिटीज

Diabetes

मधुमेह रोग में शर्करा की पाचन क्रिया संपन्न न होने से शर्करा मूत्र के साथ निकलने लगती है। शर्करा के निकलने से रोगी दिन-प्रतिदिन निर्बल होता जाता है।

यदि शर्करा पर नियंत्रण न किया जाए तो रोगी को उच्च रक्तचाप, वृक्क (गुर्दे) विकृति, रक्ताल्पता, नेत्र रोग घेर लेते हैं।

Why does Diabetes happens?

डायबिटीज क्यों होता है?

उत्पत्ति : मधुमेह रोग की उत्पत्ति अग्न्याशय अर्थात पैंक्रियाज ग्रंथि के विकृत होने से होती है। अग्न्याशय ग्रंथि के विकृत होने से इंसुलिन के अल्प मात्रा में बनने के कारण भोजन की शर्करा की पाचन क्रिया नहीं होती।

ऐसी परिस्थिति में शर्करा रक्त में मिलने लगती है या फिर मूत्र के साथ निकलने लगती है।

What are Symptoms of Diabetes?

मधुमेह रोग के लक्षण क्या है?

लक्षण : मधुमेह रोग होने पर रोगी को जल्दी-जल्दी प्यास लगती है। रोगी के मूत्र का परीक्षण करने से मधुमेह रोग का पता चलता है। रोगी के शरीर के विभिन्न अंगों में चींटियां चलती हुई-सी (रेंगती हुई-सी) अनुभव होती हैं। रोगी के जननेंद्रिय के आसपास बहुत खुजली होती है। रोगी को जल्दी-जल्दी मूत्रत्याग के लिए जाना पड़ता है। शारीरिक निर्बलता तेजी से बढ़ने लगती है।

Steps to cure Diabetes.

चिकित्सा

  • मधुमेह की चिकित्सा में भोजन में परिवर्तन का अधिक महत्त्व होता है। भोजन में कार्बोहाइड्रेट व शर्करा के खाद्य पदार्थ सेवन नहीं करने चाहिए। घी, मक्खन व दूसरे वसायुक्त खाद्य पदार्थों का सेवन भी बहुत कम मात्रा में करना चाहिए।
  • मधुमेह रोग में बेल के फल से बहुत लाभ होता है। बेल के 15-20 कोमल व ताजे पत्ते, जल से साफ करके सिल पर पीसकर जल में मिला लीजिए। पिसे हुए पत्तों को 50 ग्राम जल में मिलाकर पीने से मधुमेह रोग में शर्करा पर नियंत्रण होता है।
  • बेल के पत्तों का 10 ग्राम रस प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करने से मधुमेह रोग में बहुत लाभ होता है।
  • बेलगिरी की मींग निकालकर, नीम के कोमल पत्तों का रस मिलाकर हैजल के साथ सेवन करने से मधुमेह रोग में शर्करा पर नियंत्रण होता है।
  • बेल के पत्तों के रस में शुद्ध शिलाजीत मिलाकर पीने से लाभ होता है।
  • बेल के पत्तों का रस और करेले का रस मिलाकर पीने से शर्करा पर नियंत्रण होता है।
  • बेल के पत्तों के 10 ग्राम रस में मेथी के दानों का 5 ग्राम चूर्ण मिलाकर सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
  • बेलगिरी को छाया में सुखाकर कूट-पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें जामुन की गुठलियों का चूर्ण बराबर-बराबर मात्रा में मिलाएं। प्रतिदिन सुबह-शाम 5-5 ग्राम चूर्ण? जल के साथ सेवन करने से मधुमेह में शर्करा पर नियंत्रण होता है।
  • बेल के पत्तों को जल में उबालकर क्वाथ बनाकर छानकर पीने से मधुमेह रोग में लाभ होता है।
Loading...

Leave A Reply

Your email address will not be published.

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept